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Yatharth Sandesh
25 Jun, 2017 (Hindi)
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बिना धर्म के राजनीति विनाशकारी है : हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत
Sub Category: Bhakti Geet
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हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने कहा कि, धर्मविहीन राजनीति विनाशकारी है। उन्हें तनिक भी संकोच नहीं है कि धर्म और राजनीति में सामंजस्य बिठा कर ही कल्याणकारी राज्य की स्थापना की जा सकती है। इसपर उपाय है धर्मयुक्त राजनीति !
धर्म के आधार पर ही पक्ष और विपक्ष को एक साथ लाकर जनता के कल्याण की राह पर चला जा सकता है। देवव्रत गैरराजनीतिक पृष्ठभूमि से चुने गए राज्यपाल हैं। करीब दो साल पहले हिमाचल का जिम्मा दिए जाने से पहले उनका राजनीति से कोई सरोकार नहीं था और वे हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अपना एक ‘गुरुकुल’ चलाते थे।
देवव्रत कहते हैं कि बिना धर्म के राजनीति विनाशकारी है। धर्म और राजनीति पर कोई बयान देने से पहले वे यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि धर्म क्या है? उनका कहना है कि हमने धर्म को कुछ चिह्नों में समेट कर रख दिया है। धर्म को मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारा या गिरजाघर की चौहद्दियों तक घेर दिया गया है। कोई यह खाता है या वह पहनता है तो ये निशानियां धर्म की व्याख्या नहीं हैं।
देवव्रत कहते हैं कि जो आपकी आत्मा चाहती है वैसा ही दूसरों की आत्मा के लिए पैदा करना धर्म है। अपनी निशानियों से निकल कर दूसरों के लिए अपनी चाह जैसा करना ही धर्म है। उन्होंने कहा कि सत्तानशीनों के लिए जो राजधर्म की परिभाषा दी जाती है वह हिंदू-मुसलमान या ईसाई से बंधा हुआ नहीं है। इसका मकसद कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। यही सत्ता का भी लक्ष्य हो।
स्त्रोत : जनसत्ता
धर्म के आधार पर ही पक्ष और विपक्ष को एक साथ लाकर जनता के कल्याण की राह पर चला जा सकता है। देवव्रत गैरराजनीतिक पृष्ठभूमि से चुने गए राज्यपाल हैं। करीब दो साल पहले हिमाचल का जिम्मा दिए जाने से पहले उनका राजनीति से कोई सरोकार नहीं था और वे हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अपना एक ‘गुरुकुल’ चलाते थे।
देवव्रत कहते हैं कि बिना धर्म के राजनीति विनाशकारी है। धर्म और राजनीति पर कोई बयान देने से पहले वे यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि धर्म क्या है? उनका कहना है कि हमने धर्म को कुछ चिह्नों में समेट कर रख दिया है। धर्म को मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारा या गिरजाघर की चौहद्दियों तक घेर दिया गया है। कोई यह खाता है या वह पहनता है तो ये निशानियां धर्म की व्याख्या नहीं हैं।
देवव्रत कहते हैं कि जो आपकी आत्मा चाहती है वैसा ही दूसरों की आत्मा के लिए पैदा करना धर्म है। अपनी निशानियों से निकल कर दूसरों के लिए अपनी चाह जैसा करना ही धर्म है। उन्होंने कहा कि सत्तानशीनों के लिए जो राजधर्म की परिभाषा दी जाती है वह हिंदू-मुसलमान या ईसाई से बंधा हुआ नहीं है। इसका मकसद कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। यही सत्ता का भी लक्ष्य हो।
स्त्रोत : जनसत्ता
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