Yatharth Sandesh
02 Feb, 2018 (Hindi)
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केंद्रीय मंत्री के बाद नासा के पूर्व वैज्ञानिक ने डार्विन के सिद्धांत को बताया गलत
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लखनऊ : डार्विन के क्रमिक विकास सिद्धांत पर केंद्रीय मंत्री के बाद अब वैज्ञानिकों ने भी सवाल खडे किए हैं ! लखनऊ यूनिवर्सिटी में बुधवार को ‘वेदों में ज्योतिष तथा विज्ञान’ इस विषय पर हुए सेमिनार में नासा के पूर्व वैज्ञानिक प्रोफेसर ओपी पांडेय ने भी इसे सिरे से खारिज कर दिया । उन्होंने कहा कि देशभर के बच्चों को गलत सिद्धांत पढाया जा रहा है, जिससे उन पर बुरा प्रभाव पड रहा है । उन्होंने बच्चों को सही इतिहास पढाए जाने की सलाह दी ।
प्रोफेसर पांडेय ने कहा कि, डार्विन के सिद्धांत के अनुसार हम बंदर से चिंपैंजी और फिर मानव बने, जबकि बंदर कभी मानव बन ही नहीं सकता । बंदरों में २४ गुणसूत्र होते हैं और मनुष्यों में ४६, ऐसे में अगर बंदर से मनुष्य बने होते तो अतिरिक्त गुणसूत्र कहां से आए । समयानुकूल स्वरूप में परिवर्तन हो सकता है, लेकिन अंगों में परिवर्तन नहीं हो सकता । इसलिए यह सिद्धांत सही नहीं है !
केंद्रीय मंत्री ने भी उठाए सवाल
हाल ही में केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह ने डार्विन के सिद्धांत पर सवाल उठाए थे । इसके अगले ही दिन १०० से ज्यादा वैज्ञानिकों ने खंडन कर इस सिद्धांत को सही बताया था । इस पर प्रोफेसर पांडेय का कहना है कि एक दिन में १२०० वैज्ञानिक हस्ताक्षर कर रिट करें इससे ये साफ जाहिर है कि इसके पीछे राजनीति है ! साथ ही जिन्होंने इसका विरोध किया है वो वैज्ञानिक नहीं बल्कि टेक्नॉलजिस्ट हैं !
डार्विन के बेटे ने बताया था पिता के सिद्धांत को कल्पना
प्रोफेसर पांडेय ने बताया कि वर्ष १९०५ में डार्विन के दूसरे बेटे जॉर्ज डार्विन ने भी पिता के डार्विन सिद्धांत को कल्पना मात्र बताया था । विज्ञान और तर्क दोनों में ही यह सिद्धांत कभी भी सही साबित नहीं हुआ ।
बच्चों पर पड रहा मनोवैज्ञानिक दबाव
प्रोफेसर पांडेय ने बताया कि, इस सिद्धांत से बच्चों पर मनोवैज्ञानिक दबाव पड रहा है । इससे वह समझ रहे हैं कि वह जानवरों की उत्पत्ति है । इसीलिए उनकी सोच भी प्रभावित होती है । उन्हें यह सत्य पढाना चाहिए कि वह इंसानों की ही उत्पत्ति हैं न किसी जानवरों की !
स्त्रोत : नवभारत टाईम्स
प्रोफेसर पांडेय ने कहा कि, डार्विन के सिद्धांत के अनुसार हम बंदर से चिंपैंजी और फिर मानव बने, जबकि बंदर कभी मानव बन ही नहीं सकता । बंदरों में २४ गुणसूत्र होते हैं और मनुष्यों में ४६, ऐसे में अगर बंदर से मनुष्य बने होते तो अतिरिक्त गुणसूत्र कहां से आए । समयानुकूल स्वरूप में परिवर्तन हो सकता है, लेकिन अंगों में परिवर्तन नहीं हो सकता । इसलिए यह सिद्धांत सही नहीं है !
केंद्रीय मंत्री ने भी उठाए सवाल
हाल ही में केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह ने डार्विन के सिद्धांत पर सवाल उठाए थे । इसके अगले ही दिन १०० से ज्यादा वैज्ञानिकों ने खंडन कर इस सिद्धांत को सही बताया था । इस पर प्रोफेसर पांडेय का कहना है कि एक दिन में १२०० वैज्ञानिक हस्ताक्षर कर रिट करें इससे ये साफ जाहिर है कि इसके पीछे राजनीति है ! साथ ही जिन्होंने इसका विरोध किया है वो वैज्ञानिक नहीं बल्कि टेक्नॉलजिस्ट हैं !
डार्विन के बेटे ने बताया था पिता के सिद्धांत को कल्पना
प्रोफेसर पांडेय ने बताया कि वर्ष १९०५ में डार्विन के दूसरे बेटे जॉर्ज डार्विन ने भी पिता के डार्विन सिद्धांत को कल्पना मात्र बताया था । विज्ञान और तर्क दोनों में ही यह सिद्धांत कभी भी सही साबित नहीं हुआ ।
बच्चों पर पड रहा मनोवैज्ञानिक दबाव
प्रोफेसर पांडेय ने बताया कि, इस सिद्धांत से बच्चों पर मनोवैज्ञानिक दबाव पड रहा है । इससे वह समझ रहे हैं कि वह जानवरों की उत्पत्ति है । इसीलिए उनकी सोच भी प्रभावित होती है । उन्हें यह सत्य पढाना चाहिए कि वह इंसानों की ही उत्पत्ति हैं न किसी जानवरों की !
स्त्रोत : नवभारत टाईम्स
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